क्या इस हार के बाद भी जीत है?

क्या इस हार के बाद भी जीत है?

  • 7 अक्तूबर 2015
Image copyrightMitu khurana

भारत की पहली महिला जिसने अपने पति और उनके रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ भ्रूण हत्या के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था, वो निचली अदालत में मुक़दमा हार गईं हैं.

लेकिन डॉक्टर मीतू खुराना का कहना है कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है और वो ताज़ा आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगी.

अपने पति और उनके परिवार के ख़िलाफ़ सात साल चली क़ानूनी लड़ाई को हारने के बाद डॉक्टर मीतू खुराना सदमे में हैं.

जब हम उनसे मिलने दिल्ली के द्वारका स्थित उनके वकील के दफ़्तर पहुंचे तो उनके चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी. वो मोटी फ़ाइलों के पन्ने पलट रहीं थीं.

उन्होंने कहा, “ये आदेश उन सभी महिलाओं के लिए झटका है जो इंसाफ़ की उम्मीद कर रही थीं. अब मेरी लड़ाई लंबी और बड़ी हो गई है.”

पढ़ें विस्तार से

Image copyrightMitu Khurana

वर्ष 2008 में मीतू खुराना ने अपने पति डॉक्टर कमल खुराना, उनकी मां, एक और रिश्तेदार के ख़िलाफ़ दिल्ली के जयपुर गोल्डन अस्पताल के एक व्यक्ति की कथित मदद से भ्रूण की पहचान करने का आरोप लगाया था.

उनका आरोप है कि जब उनके पति और परिवार को पता चला कि होने वाला बच्ची लड़की है तो उन्होंने मीतू पर गर्भपात के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

भारत में प्री नेटल डायगनोस्टिक टेकनीक या पीएनडीटी क़ानून, 1994 के अंतर्गत भ्रूण के लिंग की पहचान जुर्म है, हालांकि एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल पांच लाख से ज़्यादा कन्या भ्रूण की हत्या कर दी जाती है. भारतीय समाज पर इसके असर को लेकर लोगों में भारी चिंता है.

ये ग़ैर-क़ानूनी जांच देश भर के 45,000 से ज़्यादा रजिस्टर्ड और लाखों ग़ैर-रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड क्लिनिकों में की जाती है.

लड़कियांImage copyrightRAVINDER SINGH ROBIN

वर्ष 2011 के जनसंख्या सर्वे के मुताबिक़, भारत में छह साल से कम की उम्र वर्ग में 1,000 लड़कों की तुलना में मात्र 918 लड़कियां हैं. इसी कारण नरेंद्र मोदी सरकार ने बेटी बचाओ अभियान की शुरुआत की.

डॉक्टर मीतू खुराना का आरोप है कि उन पर गर्भपात के लिए दबाव डाला गया, उन्हें मारा गया और उन्हें खाना भी नहीं दिया गया. उनके पति डॉक्टर कमल खुराना सभी आरोपों से इनकार करते हैं.

इस मामले के कारण मीतू खुराना को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली. वो महिला भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ एक महत्वपूर्ण आवाज़ बनकर उभरीं.

आमिर ख़ान के टीवी कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ में भी वो शामिल हुईं.

लेकिन इस हफ़्ते दिल्ली की एक निचली अदालत ने उनके सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया.

परिवार का दबाव

न्यायImage copyrightTHINKSTOCK

अदालत ने जयपुर गोल्डन अस्पताल के ख़िलाफ़ भी मामला निरस्त कर दिया.

मीतू खुराना के वकील अमरनाथ अग्रवाल का कहना है कि वो मामले को ऊँची अदालत में ले जाएंगे.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी महिला के लिए ये साबित करना टेढ़ी खीर है कि उनके पति के परिवार ने महिला पर कन्या भ्रूण हत्या के लिए दबाव डाला.

उधर पेशे से हड्डी के डॉक्टर कमल खुराना कहते हैं कि अदालत ने न्याय किया है.

कमल खुराना के वकील पीएस सिंगल के मुताबिक़ इस आदेश से स्पष्ट है कि मीतू खुराना ने पति, और पति के रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ मामला बनाने के लिए क़ानून का दुरुपयोग किया.

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने मीतू खुराना का पक्ष लिया है. फ़ेसबुक पर ‘आई स्टैंड मीतू खुराना’ का पेज सामने आया है.

जयपुर गोल्डन हस्पताल के विचार जानने की कोशिश की गई लेकिन किसी भी अधिकारी से संपर्क नहीं हो पाया.

मामला

डॉक्टर मीतू खुराना और डॉक्टर कमल खुराना की शादी अख़बार में छपे वैवाहिक विज्ञापन की मदद से नवंबर 2004 में हुई थी.

उनका आरोप है कि शादी के बाद से ही उन पर दहेज के लिए दबाव पड़ने लगा था लेकिन जब उनके गर्भवती होने का पता चला तो उन पर भ्रूण का लिंग पता लगाने के लिए दबाव पड़ने लगा.

वर्ष 2005 में एक दिन उनके पेट की अल्ट्रासाउंड के बहाने जयपुर गोल्डन अस्पताल ले जाया गया जहां कथित तौर पर ग़ैर-क़ानूनी तौर पर भ्रूण के लिंग की जांच की गई.

वो कहती हैं, “मुझ पर गर्भपात के लिए भारी दबाव था. मेरे साथ हिंसा की गई. मैंने कहा कि लड़कियां पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी.”

11 अगस्त 2005 को गुड्डू और परी जुड़वा बच्चों का जन्म हुआ.

मीतू खुराना का आरोप है कि बच्चियों के साथ बुरा व्यवहार किया गया और उनके साथ हिंसा में बढ़ोत्तरी आ गई.

मीतू खुराना कहती हैं कि 2008 में उनके हाथ एक ऐसा दस्तावेज़ आया जो इस बात का सुबूत था कि अस्पताल में भ्रूण के लिंग की जांच की गई, लेकिन डॉक्टर खुराना इस आरोप से इनकार करते हैं.

वो कहते हैं, “इस केस ने मुझे भारी नुक़सान पहुंचाया है. मेरे पिता की मौत हो चुकी है. मेरा करियर मुसीबत में है. मैं अपने बच्चों से नहीं मिल पा रहा हूं. मेरा परिवार ख़त्म हो गया है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वो (मीतू) क्या चाहती हैं.”

आसान नहीं

साबू जॉर्ज ऐसे मामलों पर सालों से काम करते रहे हैं.

वो कहते हैं, “हमें न्याय की उम्मीद थी लेकिन ये याद रखने की ज़रूरत है कि ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति के सामने महिला विरोधी व्यवस्था खड़ी रहती है. जो बात महत्वपूर्ण है वो ये कि उन्होंने अभी तक हिम्मत नहीं हारी है.”

साबू जॉर्ज के मुताबिक़, “ये इस देश की सच्चाई है जहां भ्रूण की जांच को अपराध के तौर पर नहीं देखा जाता. और ये डरावनी बात है.”

संजय पारिख एक वकील हैं और वो सालों से देश भर में इस क़ानून के क्रियान्वयन की मांग करते रहे हैं.

वो कहते हैं, “भ्रूण जांच की समस्या अमीरों, पढ़े लिखों में ज़्यादा है, न कि ग़रीबों, आदिवासियों में.”

दिल्ली से लगे पंजाब और हरियाणा ऐसे दो राज्य हैं जहां कन्या भ्रूण हत्या की समस्या सबसे भयावह है. और आज हालत ये है कि उन दो राज्यों में शादी के लिए पुरुषों को राज्यों के बाहर या फिर देश के बाहर का रुख़ करना पड़ रहा है.

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Author: savedaughters19

This is a coverage of my struggles to save my daughters.I am thank full to my parents not only for Not killing me ,but also helping me save my daughters... My dream- A big shelter house for women who want to give birth to their daughters and raise them up with dignity and self respect , but have to fight their own families to do so. Will have medical facilities and facilities for legal aid. will have training centers for vocational courses so that they can stand up on their own two feet and stop the dependency on their husbands for finances, A child care center run and managed by the inmates, A kitchen and a vegetable farm run and managed by the inmates. At present only a dream.... But with grace of God will become a reality. God will show the way and means to achieve the dream.

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