बेटी बनकर पैदा होना कोई पाप तो नहीं

जयपुर। सुरक्षा की बात हो या कन्या भ्रूण हत्या को रोकने की सिर्फ कानून बनाने से ही यह नहीं रोकेगा। लड़कियों को लेकर समाज का नजरिया जब तक नहीं बदलता, तब तक कुछ नहीं होगा। परिवर्तन सरकार नहीं ला सकती। राजस्थान यूनिवर्सिटी नेहरू स्टडी सेंटर और राजनीति विभाग की ओर से इस वर्कशॉप का आयोजन किया गया। दो दिवसीय इस वर्कशॉप में राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा भी मौजूद थी। इस मौके पर उन्होंने कहा कि सिर्फ कन्या पूजन या नारी को देवी की उपमा देना ही काफी नहीं और ना ही इससे लैंगिक हिंसा को समाप्त किया जा सकता है। अब समय आ गया है जब हम सामाजिक कुरीतियों और उदासीनता के खिलाफ आगे आकर आवश्यक कदम उठाने होंगे।

सेमिनार में मौजूद विशिष्ट अतिथि एमएल स्वर्णाकार ने कहा कि कितनी अजीब बात हैं आज हम ग्लोबलाइजेशन की बात करते हैं लेकिन घर में बेटी के पैदा पर होने पर उत्सव नहीं होता। यहां तक कि दूसरी संतान के तौर लड़की कोई नहीं चाहता। राजनीति विज्ञान की विभागाध्यक्ष प्रो. शशि सहाय ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। तथा इस गंभीर विषय की प्रासंगिकता से सभी को अवगत कराया। वो सैकंड ऑप्शन नहीं  सेमिनार की मुख्य वक्ता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन प्रो. चन्द्र कला पाडिया कहने लगीं हमारी सामाजिक आर्थिक राजनैतिक संरचना इस प्रकार बन गई है जिसमें नारी को दोयम दर्जा दिया गया है। फिर चाहे वो परिवार हो या सामाजिक संरचना छोटी से छोटी कड़ी पर जब बड़े स्तर के बदलाव आएंगे, तब ही महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसाओं पर रोक होगी। सत्यमेव जयते को भी किया गया याद सेमिनार के दौरान एक्सपर्ट ने सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले आमिर खान के सीरियल सत्यमेव जयते का भी जिक्र किया। ह्यूमन राइट्स से जुड़े और सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप जिंदल कहने लगे ऐसा नहीं है कि सिर्फ गांवों में या रिमोट एरिया में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या नहीं है बल्कि मेट्रो सिटीज में भी यह आम बात है।

आमिर के शो के पहले एपिसोड में आई दिल्ली की डा. मीतू खुराना के बारे में बात करते हुए वे कहने लगे वो लड़की खुद डॉक्टर थी और उसका पति भी। उसके बावजूद भी सुसराल पक्ष और उसके पति ने लिंग जांच करवाने के लिए जोर डाला और जब पता चला गर्भ में बेटी है तो उसे अबॉर्ट करवाने के लिए भी दबाव डाला। डा. मीतू अब अपने दो जुड़वा बेटियों के साथ अलग रहती हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि पढ़े लिखे घरों में भी लड़कियों को लेकर कुछ ऐसी ही सोच है। आखिर बेटी होकर पैदा होना कोई पाप तो नहीं।

Photo-Mahendra Sharma

This page printed from: http://www.bhaskar.com/article/c-10-1465330-3642047.html

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