कोमल हैं पर कमजोर नहीं

अविनाश चंद्र, नई दिल्ली मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल, मगर लोग आते गए और कारवां बनता गया। ये पंक्तियां कुछ वर्ष पहले भ्रूण के लिंग परीक्षण व कन्या भ्रूण हत्या की मुखालफत का साहस करने वाली महिला चिकित्सक डॉ. मीतू खुराना पर सटीक बैठती हैं। अपने साथ हुए अत्याचार को हथियार बनाकर अकेले ही कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहिम शुरू करने वाली दिल्ली की इस महिला के साथ आज देश-विदेश की हजारों महिलाएं जुड़ चुकी हैं। हालांकि सब कुछ इतना आसान नहीं था। आरंभ में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन डॉ. मीतू खुराना ने हार नहीं मानी। डॉ. मीतू राजधानी स्थित जनकपुरी ए ब्लाक में रहती हैं। मीतू ने वर्ष 2000 में पुणे स्थित आयुर्विज्ञान संस्थान से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह दिल्ली स्थित रेलवे अस्पताल में कार्य करने लगीं। वर्ष 2004 में उनकी शादी दिल्ली के ही डॉ. कमल खुराना से कर दी। शुरू में तो सब कुछ ठीकठाक रहा, लेकिन वर्ष 2005 में जब डॉ. मीतू गर्भवती हुई तो उनके पति व अन्य ससुराल वालों का असली रूप सामने आने लगा। ससुराल वालों ने मीतू पर भ्रूण के लिंग परीक्षण कराने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। मीतू के इनकार पर धोखे से अल्ट्रासाउंड करा भ्रूण का लिंग परीक्षण करा लिया गया, लेकिन जैसे ही पता चला कि मीतू के गर्भ में पलने वाला भ्रूण कन्या है और वह भी जुड़वा तो उन पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया जाने लगा। इनकार करने पर न केवल मीतू के साथ मारपीट की गई, बल्कि गर्भावस्था में ही उन्हें घर से निकाल दिया गया। इतना होने के बावजूद मीतू ने हार नहीं मानी और पति व ससुराल के लोगों सहित अस्पताल प्रशासन के खिलाफ भी मुहिम छेड़ दी। तमाम धमकियों व दबाव को झेलते हुए मीतू ने जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया और भ्रूण हत्या के खिलाफ अकेले ही लड़ाई शुरू कर दी। उन्होंने महिलाओं के लिए संस्था का गठन किया, जिसमें न केवल दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि शहरों की महिलाएं शामिल हैं, बल्कि दुबई, सिंगापुर, मेलबर्न, सैन फ्रांसिसको, वाशिंगटन डीसी की लगभग 15 हजार महिलाएं सक्रिय रूप से शामिल हैं। प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर वैश्विक स्तर पर महिला सशक्तिकरण के लिए विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा घरों में जाकर लोगों को भू्रण हत्या व लिंग परीक्षण के खिलाफ शपथ दिलाई जाती है। अपनी प्रताड़ना के दिनों को याद करते हुए डॉ. मीतू कहती हैं कि ससुराल में पूरा परिवार पढ़ा-लिखा व सक्षम होने के बावजूद उनकी बच्चियों को बोझ समझा गया और उनकी हत्या करने की साजिश रची गई। बुराई के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ी लड़ाई : डॉ. मीतू ने ससुराल वालों से न्याय पाने के लिए नन्हीं बच्चियों के साथ महिला आयोग, पुलिस व कोर्ट कचहरी के वर्षो तक चक्कर काटे। अंतत: अदालत ने मामले में संज्ञान लिया और डॉ. मीतू के ससुरालियों व अस्पताल प्रशासन के खिलाफ नोटिस जारी किया। हाईकोर्ट ने डॉ. मीतू के पति डॉ. कमल खुराना को प्रतिमाह आठ हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का भी आदेश दिया। यह मामला अब भी अदालत में चल रहा है। आज डॉ. मीतू की दोनों बच्चियां छह वर्ष की हो गई हैं। दोनों राजधानी के अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं।

Dainik jagran

source-http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=2&category=&articleid=111722307374090344

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Author: savedaughters19

This is a coverage of my struggles to save my daughters.I am thank full to my parents not only for Not killing me ,but also helping me save my daughters... My dream- A big shelter house for women who want to give birth to their daughters and raise them up with dignity and self respect , but have to fight their own families to do so. Will have medical facilities and facilities for legal aid. will have training centers for vocational courses so that they can stand up on their own two feet and stop the dependency on their husbands for finances, A child care center run and managed by the inmates, A kitchen and a vegetable farm run and managed by the inmates. At present only a dream.... But with grace of God will become a reality. God will show the way and means to achieve the dream.

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