बेटियों को बचाने के लिए पति से भिड़ गई वो!

नई दिल्ली। कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ बना कानून आज भी सिर्फ वक्तव्यों और भाषणों में ही सुनाई देता है। सिटिजन जर्नलिस्ट डॉ मीतू खुराना इस कानून के तहत शिकायत दर्ज करने वाली पहली महिला हैं। इसकी वजह से इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज हुआ। दिल्ली की रहने वाली मीतू की दो बच्चियां गुड़्डु और परी आज से 4 साल इस दुनिया में नहीं आती अगर इनकी मां इनके लिए ढाल ना बनी होती। इन्हें जन्म लेने से पहले ही मारने की तैयारी थी और वह शख्स कोई और नहीं खुद इनके पिता थे। 2004 में मीतू खुराना की शादी एक पढ़े लिखे परिवार में हुई। पति पेशे से डॉक्टर थे। शादी के बाद 2005 में जब वो गर्भवती हुईं तो मालूम हुआ कि वो जुड़वा बच्चों की मां बनने वाली हैं।

मीतू के मुताबिक-मेरे पति और मेरे सास, ससुर खुश होने के बजाए उनके पर सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट करवाने के लिए दबाव बनाने लगे क्योंकि वो जानना चाहते थे कि गर्भ में बेटा है या बेटी? जब मीतू ने टेस्ट के लिए मना किया तो उन्होंने उसे प्रताड़ित करना शुरु कर दिया। एक दिन तबियत ज्यादा खराब होने पर मीतू के पति और सास उसे अस्पताल ले गए जहां गायनेकेलॉजिस्ट डॉक्टरों ने जांच कर केयूबी (किडनी, यूरेटर, ब्लैडर) अल्‍ट्रासाउंड करने की सलाह दी। लेकिन ससुराल वालों ने धोखे से नीतू का फीटल अल्‍ट्रासाउंड किया।

अल्ट्रासाउंड में जब उन्हें पता चला कि नीतू के गर्भ में दो बेटियां हैं, तो वो उसके ऊपर और जुल्म करने लगे। गर्भ गिराने के लिए नीतू पर दबाव बढ़ने लगा, लेकिन वो अपनी बेटियों को जन्म देना चाहती थी। जब नीतू के माता पिता को इस बारे में पता चला तो वो उसे अपने घर ले आए। यहीं रहते हुए नीतू ने 11 अगस्त 2005 को दो प्यारी बेटियों को जन्म दिया। 2008 में नीतू के पति ने उसपर तलाक के लिए दबाव बनाया ताकि वह दूसरी शादी कर सके, और उससे बेटा पैदा करे। लेकिन नीतू ने तलाक देने से इनकार कर दिया और मायके आ गई। समझौते के तमाम प्रयासों के नाकाम हो जाने पर दो साल पहले नीतू ने वूमेन कमीशन, स्वास्थ्य मंत्रालय और अल्ट्रासाउंड करने वाले जयपुर गोल्डन अस्पताल के साथ ही अपने ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई। उसके बाद उसने 9 मई 2008 को PCPNDT के तहत CDMO नॉर्थ वेस्ट को शिकायत की।

21 मई को नीतू ने एक आरटीआई डाली जिसमें उसने अपनी शिकायत पर हुई कार्रवाई का ब्योरा मांगा। आरटीआई में जवाब दिया गया कि जयपुर गोल्डन अस्पताल में रेड के दौरान पता चला कि जो अल्ट्रासाउंड हुआ था उसका फॉर्म F नहीं भरा गया था। उसके बाद इस मामले पर एक जांच कमेटी बिठाई गयी। जिसमें सारे सबूत होते हुए भी ये फैसला दिया गया कि सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट का कोई सबूत नहीं है जबकि कानून कहता है कि जिस अस्पताल या क्लिनिक में अल्ट्रसाउंड के दौरान फॉर्म एफ नहीं मिलेगा वो सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट का दोषी माना जाएगा। जांच कमेटी की इस रिपोर्ट के खिलाफ नीतू ने स्वास्थ मंत्री किरण वालिया से शिकायत की जिसके बाद उन्होंने एक और जांच कमेटी को जांच के आदेश दिए। दूसरी जांच कमेटी ने ये माना कि किसी ने भी फेटल अल्ट्रासाउंड नहीं मांगा था। सितंबर 2008 को एप्रोप्रिएट एथॉरिटी की एक मीटिंग हुई जिसमें ये फैसला लिया गया कि जयपुर गोल्डन अस्पताल को एक वार्निंग देकर छोड़ दिया जाए।

18 अक्तबूर को नीतू ने कानून के तहत CDMO को एक लीगल नोटिस भेजा जिसमें उसने 15 दिनों बाद अपने कोर्ट में जाने का जिक्र किया। इसके बाद CDMO ने डाइरेक्टर ऑफ प्रोसिक्यूशन को चिट्ठी लिखी और 19 जनवरी को जयपुर गोल्डन के डायरेक्टर के खिलाफ केस फाइल कर दिया गया। जयपुर गोल्डन के डायरेक्ट के खिलाफ लोअर कोर्ट ने कॉगनिजेंस ले ली और उसके खिलाफ जयपुर गोल्डन अस्पताल हाई कोर्ट चला गया। कानून ये कहता है कि टेस्ट करवाने वाला और उसमें शामिल होने वाला हर व्यक्ति उतना ही दोषी है जितना कि टेस्ट करने वाला। लेकिन उसके बावजूद अभी तक नीतू के पति और सासुराल वालों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की गई है। इसलिए नीतू ने इन लोगों के खिलाफ निचली अदालत में केस दर्ज कर दिया है।

नीतू बताती हैं कि अपनी इस लड़ाई के दौरान वे जान चुकी हैं कि कानून कितना लाचार है और किस तरह से इस व्यवस्था में काम किया जाता है। ऐसे कई क्लिनिक है जहां लिंग परीक्षण जांच का धंधा जोरों से चल रहा है। लेकिन सरकार उनके आगे कितनी बेबस हैं इसका पता मुझे अपनी दूसरी आरटीआई के जरिए मालूम पड़ा। नीतू कहती हैं कि मुझे पता चला कि दिल्ली में क्लिनिक ‘फॉर्म एफ’ ना भरे जाने के कारण, रिकॉर्ड ठीक से ना रखे जाने के कारण या तो सील कर दिए जातें हैं, उन्हें वार्निंग देकर या एफिडेविट देकर छोड़ दिया जाता है जो कानून के खिलाफ है।

ये बात तो सिर्फ एक ही शहर की है लेकिन पूरे भारत में लिंग परीक्षण जांच का ये धंधा खूब फल फूल रहा है जिसकी वजह से हर साल एक करोड़ से भी ज्यादा भ्रूण हत्याएं हो रही है और ये सब पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे फल फूल रहा है। इसके खिलाफ कानून तो बना दिए लेकिन उसको लागू कराने में सरकार भी नाकाम है ये इसका पता इसी बात से चलते है कि 15 साल इस कानून को बने हुए हो गए लेकिन शिकायत करने वाली सिर्फ मैं एक अकेली महिला हूं।

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