“चाह कर भी वे मेरी बेटियों को मार नहीं पाएंगे”

“चाह कर भी वे मेरी बेटियों को मार नहीं पाएंगे”
20 November 2009 13 Comments
♦ अनुपमा

मीतू खुराना। किसी कहानी या उपन्यास की काल्पनिक पात्र नहीं। पढ़ी-लिखी और देश की राजधानी में रहने वाली एक महिला का नाम। पेशे से पेडियाटि­शियन हैं। उनके पति डॉ कमल खुराना (आर्थोपेडिक सर्जन) रोहिणी में रहते हैं। पर आप सोच रहें होंगे, इसमें बताने जैसी क्‍या बात है? बात है। ध्यान से सुनिए। मीतू ने अपराध किया है। कानून की नज़र में नहीं। ससुराल वालों की नजर में। उन्होंने अपराध किया है बेटियों को जन्म देने का। उन्‍हें कोख में ही न मार डालने का। जन्म के बाद भी उनसे लगाव रखने का। इसकी वजह से उन्हें बार-बार घर से निकाला गया और आज वो अपने मायके में हैं। पति से अलगाव की हद तक अपनी नवजात बच्चियों की परवाह करने वाली नीतू वूमेन आफ सब्स्टांस हैं। सुनते हैं, उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी…

हर लड़की यह सोचती है कि उसकी शादी अच्छे घर में हो। पति उसे चाहनेवाला हो और एक सपनों का घर हो। जिसे वह सजाये-संवारे और एक खुशहाल परिवार बनाये। मैंने भी कुछ ऐसे ही ख्‍़वाब बुने थे। अभी-अभी तो उसे संजोना और बुनना शुरू ही किया था मैंने। पर कब सब कुछ बिखरना शुरू हुआ, पता ही नहीं चला। खैर… सीधी-सीधी बात बताती हूं। शादी नवंबर 2004 में डॉ कमल खुराना से हुई। कहने को तो अच्छा घर था, पर यहां आते ही मुझे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। मैं यह सब जुल्म चुपचाप सहती रही कि चलो कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शादी के दो महीने बाद ही यानी जनवरी 2005 में मैं गर्भवती हो गयी। गर्भ के साथ ही मेरे सपने भी आकार ले रहे थे। छठवें सप्‍ताह में मेरा अल्‍ट्रासाउंड हुआ और यह पता लगा कि मेरे गर्भ में एक नहीं बल्कि दो-दो ज़‍िंदगियां पल रही हैं। मेरा उत्साह दुगना हो गया। मैं बहुत खुश थी। परंतु मेरी सास मुझ पर सेक्‍स डिटर्मिनेशन करवाने के लिए दबाव डालने लगीं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। ऐसा करने पर मुझे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा। इसमें मेरे पति की भूमिका भी कम नहीं थी। मेरा दाना-पानी बंद कर दिया गया और रोज़-रोज़ झगड़े होने लगे। मुझे जीवित रखने के लिए रात को मुझे एक बर्फी और एक गिलास पानी दिया जाता था। गर्भावस्था में ऐसी प्रताड़ना का दुख आप खुद समझ सकते हैं। इस मुश्किल घड़ी में भी मेरे मायके के लोग हमेशा मेरे साथ रहे। शायद इसी वजह से मैं आज जीवित भी हूं।

चलिए आगे का हाल बताती हूं। जब मैं गर्भ चयन के लिए प्रताड़ना के बाद भी राज़ी नहीं हुई तो इन लोगों ने एक तरकीब निकाली। यह जानते हुए कि मुझे अंडे से एलर्जी है, उन्होंने मुझे अंडेवाला केक खिलाया। मेरे बार-बार पूछने पर कि इसमें अंडा तो नहीं है, मुझसे कहा गया कि नहीं, यह अंडारहित केक है। केक खाते ही मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। मुझमें एलर्जी के लक्षण नजर आने लगे। मझे पेट में दर्द, उल्टी व दस्त होने लगा। ऐसी हालत में मुझे रात भर अकेले ही छोड़ दिया गया। दूसरे दिन पति और सास मुझे अस्पताल ले गये। लेकिन वो अस्पताल नहीं था। वहां मेरा एंटी नेटल टेस्ट हुआ था। मुझे लेबर रूम में ले जाया गया। यहां पर गायनेकेलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) ने मेरी जांच कर केयूबी (किडनी, यूरेटर, ब्लैडर) अल्‍ट्रासाउंड करने की सलाह दी। लेकिन वहां मौजूद रेडियोलॉजिस्ट ने सिर्फ मेरा फीटल अल्‍ट्रासाउंड किया और कहा कि अब आप जाइए। जब मैंने देखा और कहा कि गायनेकेलॉजिस्ट ने तो केयूबी अल्‍ट्रासाउंड के लिए कहा था, आपने किया नहीं, तो उसने कहा कि ठीक है आप लेट जाइए और उसके बाद उसने केयूबी किया।

इस घटना के बाद तो प्रताड़नाओं का दौर और भी बढ़ गया। मेरे पति व ससुराल वाले मुझे गर्भ गिराने (एमटीपी) के लिए ज़ोर देने लगे। मेरी सास ने तो मुझसे कई बार यह कहा कि यदि दोनों गर्भ नहीं गिरवा सकती, तो कम से कम एक को तो गर्भ में ही ख़त्म करवा लो। दबाव बनाने के लिए मेरा खाना-पीना बंद कर दिया गया। मेरे पति मुझसे अब दूरी बरतने लगे और एक दिन तो उन्होंने रात के 10 बजे मुझे यह कह कर घर से निकाल दिया कि जा अपने बाप के घर जा। जब मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे मेरा मोबाइल और अपने कार की चाभी ले लेने दीजिए, क्‍योंकि गर्भावस्था में मैं खड़ी नहीं रह पाऊंगी तो उन्होंने कहा कि इस घर की किसी चीज़ को हाथ लगाया तो थप्पड़ लगेगा… मेरे ससुर ने हस्तक्षेप किया और कहा कि इसे रात भर रहने दो, सुबह मैं इसके घर छोड़ दूंगा। उनके कहने पर मुझे रात भर रहने दिया गया। सास की दलील थी कि दो-दो लड़कियां घर के लिए बोझ बन जाएंगी, इसलिए मैं गर्भ गिरवा लूं। अगर दोनों को नहीं मार सकती तो कम से कम एक को तो ज़रूर ख़त्म करवा लूं। जब मैं इसके लिए राज़ी नहीं हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है यदि जन्म देना ही है, तो दो, लेकिन एक को किसी और को दे दो।

आज भी मुझे वह भयानक रात याद है। तारीख थी 17 मई 2005… इतना गाली-गलौज और डांट के बाद मैं घबरा गयी थी और उस रात को ही मुझे ब्लीडिंग शुरू हो गयी। इतना खून बहने लगा कि एबॉर्शन का ख़तरा मंडराने लगा। खुद तो मदद करने की बात छोड़िए, चिकित्सकीय सहायता के लिए मेरे पिता को भी मुझे बुलाने की इजाज़त नहीं दी गयी। मैंने किसी तरह तड़पते-कराहते रात गुज़ारी और सुबह किसी तरह फोन कर पापा को बुला पायी। पापा के काफी देर तक मनुहार के बाद मेरे पति मुझे नर्सिंग होम ले जाने को तैयार हो गये। लेकिन खीज इतनी कि गाड़ी को सरसराती रफ्तार से रोहिणी से जनकपुरी तक ले आये। उस बीच मेरी जो दुर्गति हुई होगी, उसकी कल्पना आप खुद भी कर सकते हैं।

इन तीन घटनाओं और बार-बार गर्भपात करवाने की ज़ोर-जबरदस्ती के बाद मेरे पिता ने मुझे अपने पास बुला लिया। मेरी पूरी ऊर्जा बस इसी में लगी हुई थी कि मुझे अपने गर्भ में पल रही जुड़वां बेटियों को जन्म देना है। परंतु जुड़वां बच्चियों की वजह से मेरे ससुरालवालों ने टेस्ट करवाने और अस्पताल ले जाने की ज़हमत कभी नहीं उठायी। ऐसे समय में मेरी मां हर पल मेरे साथ थीं। इतने पर भी मेरे पति को बरदाश्त नहीं हुआ। वह अक्‍सर मेरे घर आकर भी मुझसे लड़ाई किया करते थे। चूंकि मैंने गर्भपात नहीं करवाया, इसलिए मेरे पति ने तो डीएनए टेस्ट तक की मांग कर दी ताकि यह पता लगाया जा सके कि पिता कौन है? ऐसा इसलिए कि मेरी सास को किसी साधु ने बताया था कि उनके बेटे को सिर्फ एक पुत्रधन की प्राप्ति होगी। मुझे उनकी ऐसी सोच से बहुत गहरा आघात लगा। मैंने अपनी सास को कई बार समझाया कि बेटा और बेटी के लिए मां नहीं बल्कि पिता जिम्मेवार होता है, तो उनकी प्रतिक्रिया यह थी कि इसके लिए जिम्मेवार मैं हूं क्‍योंकि मैंने अबॉर्शन के लिए मना कर दिया। खैर… यह सब चलता रहा और तनावों के बीच मैंने समय से पहले ही यानी 11 अगस्त 2005 को प्री-टर्म बेबी को जन्म दिया। मेरी बेटियां ज़‍िंदगी से जूझ रही थीं। जन्म के नौ दिनों बाद भी मेरे ससुराल से उन्हें देखने के लिए कोई नहीं आया। दसवें दिन नेरी ननद, मेरी सास और ससुर मुझसे मिलने आये। मेरी एक चाची ने मेरी ननद से खुश होते हुए कहा कि बुआ बनने पर बधाई हो। लेकिन खुश होने के बजाय मेरी ननद ने कहा कि भगवान बचाये, दुबारा हमें यह दिन न देखना पड़े। बात आयी-गयी हो गयी। अब दुखी होने का मौसम लगता है गया? मेरी सास बहुत खुश थीं कि बेटियां सातवें महीने में हुई हैं, इसलिए इनका बचना मुश्किल है। मेरी छोटी बिटिया को तो एक महीने तक अस्पताल में ही रखना पड़ा। पर मैं खुश हूं कि अब वे दोनों स्वस्थ हैं और अब तो स्कूल जाने लगी हैं। अस्पताल का खर्च भी अच्छा-खासा था पर मेरे ससुराल के लोगों ने एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी। ऐसी मुश्किल घड़ी मे मेरे पापा हमेशा मेरे साथ रहे और अस्पताल का सारा खर्च उन्होंने ही वहन किया। यदि पापा जीवन के इस कठिन मोड़ पर या यूं कहें कि हर विपत्ति की घड़ी में मेरे साथ न होते तो न जाने मेरा और मेरी बच्चियों का क्‍या हश्र हुआ होता?

चूंकि शादी के बाद ससुराल ही लड़की का अपना घर होता है। यह सोचकर मैंने भी प्रताड़नाओं के बावजूद कई बार ससुराल वापस जाने की कोशिश की। हालांकि वहां उनके शब्दबाण मुझे छलनी कर जाते थे। मैं खुद यह सब बरदाश्त कर सकती थी, लेकिन मेरी बच्चियों को वहां कोई नहीं पूछता था। मेरी और मेरी बच्चियों के लिए वहां लेस मात्र भी प्यार नहीं था। अब तो मुझे इस बात का भी एहसास हो गया कि मैं और मेरी बच्चियों की ज़‍िंदगी यहां ख़तरे में है। मेरी सास ने मेरी चार माह की बच्‍ची को सीढ़ियों से धकेल दिया और कहा कि एक्‍सीडेंटली ऐसा हो गया। पर यकीन मानिए मेरी खुशकिस्मती थी कि मैं समय पर आ गयी और बच्‍ची के कैरी कॉट को थाम लिया।

आखिर कब तक मैं उन्हें मौत के मुंह में धकेले रखती? मेरी बच्चियों के लिए किसी के भी मन में कोई प्यार और संवेदना नहीं थी। दादा-दादी और बुआ सब उनकी अवहेलना करते थे। इसके बावजूद मैंने तीन सालों तक लगातार यह कोशिश की मेरी ससुराल के लोग इन्हें अपना लें और बच्चियों को एक स्थायी घर और प्रेम का वातावरण मिले। पर ऐसा हो न सका। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं इतने दिनों तक यह सब क्‍यों सहती रही? मैंने इनके ख़‍िलाफ़ कोई शिक़ायत क्‍यों नहीं दर्ज करवायी? पर ऐसा नहीं है। मैंने गर्भावस्था के दौरान सेक्‍स डिटर्मिनेशन टेस्ट करवाने के लिए और गर्भपात पर जोर दिये जाने के ख़‍िलाफ़ पुलिस में शिक़ायत दर्ज करवायी थी। साथ ही थाने में यह गुहार भी लगायी थी कि उनके ख़‍िलाफ़ कोई एक्‍शन न लिया जाए। चूंकि मैं सोचती थी कि बच्चियों के जन्म के बाद शायद उन लोगों के मन में बच्‍चों के प्रति प्रेम उमड़ आएगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अति तो तब हो गयी, जब मार्च 2008 में मेरे पति ने आधी रात को मुझे घर से बेदखल कर दिया और मुझसे कहा कि तुम आपसी सहमति से तलाक ले लो। ऐसा इसलिए ताकि वह दूसरी शादी कर सकें और उससे बेटा पैदा कर सकें। मुझे इस बात का अंदेशा पहले से ही था कि वो ऐसा कर सकते हैं। इसलिए मैंने इस बार के प्रवास में जबरन कराये गये अल्‍ट्रासाउंड के काग़ज़ात और अन्य अस्पताल के काग़ज़ात, जो कि मेरे पति के कब्जे में रहते थे, वो सब ले लिये। अब मैंने इनके ख़‍िलाफ़ शिक़ायत दर्ज करायी है ताकि मेरे आंसुओं का हिसाब मिले न मिले, मेरी बच्चियों को एक सुखद जीवन मिल सके। तमाम तरह की कोशिशों और समझौतों से थकने के बाद 10 अप्रैल, 2008 को मैंने वूमेन कमिशन, स्वास्थ्य मंत्रालय व कई स्वयंसेवी संगठनों में अपनी शिक़ायत दर्ज करवायी।

9 मई, 2008 को मैने पीएनडीटी सेल में भी शिक़ायतनामा दर्ज करवाया। पिछले साल छह जून को मुझे आरटीआई के आवेदन के आलोक में जवाब आया कि मानिटरिंग कमिटी व डिस्ट्रिक्‍ट एप्रोप्रिएट अथॉरिटी (उत्तर पश्चिम दिल्ली) ने तीन जून को अस्पताल पर रेड किया और पाया कि फार्म-एफ नहीं भरा गया है। (और यह सच भी है)। चूंकि इसका भरा जाना जरूरी होता है। कानून में दर्ज है – (“Person conducting ultrasonography on a pregnant woman shall keep complete record thereof in the clinic/centre in Form-F and any deficiency or inaccuracy found therein shall amount to contravention of provisions of section-5 or section-6 of the Act, unless contrary is proved by the persons conducting such ultrasonography”)

सेक्‍शन पांच व छह के अनुसार गर्भवती स्त्री की अल्‍ट्रासोनोग्राफी की सहमति ली जानी व गर्भ में पल रहे बच्चे के सेक्‍स के बारे में जानकारी किसी को न देने की बात कही गयी है। गर्भवती स्त्री को इससे होनेवाले साइड इफेक्‍ट व बाद के प्रभावों की जानकारी देना व उसकी सहमति अनिवार्य है। पर मेरे केस में ऐसा नहीं हुआ। जबरन ऐसा करवाना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद अब तक अस्पताल पर कोई भी कारर्वाई नहीं की गयी है। जब मेरे मामले को मीडिया ने हाइलाइट किया, तो मेरे पास डिस्ट्रिक्‍ट एप्रोप्रिएट अथॉरिटी का एक खत आया कि मैं उनके समक्ष जाकर अपनी बात रखूं। मैं अपने एक मित्र के साथ वहां जाकर सीडीएमओ से मिली और पूछा कि इस केस में मेरे बयान का क्‍या महत्व है, तो मुझे समझाया गया कि कानून को व्यापक करने की ज़रूरत है। मुझे बहुत इंपल्सिव तरीके से इस मामले में कोई काम नहीं करना चाहिए, जिसकी कीमत मुझे बाद में अदा करनी पड़े। मुझसे यह भी कहा गया कि मैं अपने पति से बात करूं और उनकी बात मान लूं। अगर उनकी मांग एक बेटे की है, तो मैं उसे पूरा कर सकती हूं। मैं बार-बार गर्भवती हो सकती हूं और जब बेटा हो तो उसे जन्म दे सकती हूं। मुझे तो यह समझाने की भी चेष्‍टा की गयी कि अल्‍ट्रासाउंड मशीन डायग्नोसिस के लिए कितना ज़रूरी है और अगर उसे सील कर दिया गया तो कुछ लोग उसकी सुविधा का लाभ लेने से वंचित रह जाएंगे। अंत में मुझसे कहा गया कि मैं अपने पति से समझौता कर लूं ताकि डॉक्‍टरों को परेशान न होना पड़े। मैंने जब उपर्युक्त सवालों के सीडीएमओ द्वारा पूछे जाने को लेकर केंद्र व राज्य के पीएनडीटी विभाग से यह पूछा कि मुझसे इस तरह की बातें सीडीएमओ ने क्‍यों कहीं, क्‍या औरतें सिर्फ बच्‍चा जनने की मशीन हैं, जब तक कि बेटा पैदा न करे – पर मुझे दोनों में से कहीं से भी कोई जवाब नहीं मिला।

अंत में मैंने एक प्राइवेट केस पीसी-पीएनडीटी एक्‍ट के तहत नवंबर 2008 में दर्ज करवाया। जनवरी 2009 में एप्रोप्रिएट अथॉरिटी ने भी जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल के ख़‍िलाफ़ केस फाइल किया है। लेकिन दोनों ही मामले अभी तक लंबित हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की डॉ किरण वालिया ने मेरे केस को री-ओपन करवाया था। उन्होंने यह भी देखा कि सीडीएमओ जो मेरे केस को देख रहे थे, वह बदल गये हैं। उनके सहयोग के लिए मैं उनकी आभारी हूं। पर अफ़सोस के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि मैं चौतरफा मार झेल रही हूं। हर अथॉरिटी चाहे वह पुलिस हो, ज्युडिसियरी या अस्पताल – जहां मैं काम करती हूं – की ओर से केस वापस लेने का दबाव पड़ रहा है। इस प्रताड़ना और धमकियों की वजह से मुझे अपनी नौकरी तक छोड़नी पड़ी। यकीन मानिए, यहां तक कि हाईकोर्ट के जज ने भी मुझे अपने पति से रीकौंसाइल की सलाह दे डाली। जब मैंने पूछा कि रीकौंसाइल से क्‍या आशय है आपका? तो उन्होंने कहा कि मुझे अपने पति के साथ रहना चाहिए। इस पर मैंने उनसे कहा कि – चाहे मैं और मेरी बेटियों को जान से ही हाथ धोना क्‍यों न पड़े, इस पर जज साहब ने कहा कि यदि मैं अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती हूं तो कम से कम मैं उन्हें आपसी सहमति से तलाक दे दूं। इस बात के जवाब में मैंने सिर्फ इतना ही कहा कि मैं ऐसा तभी करूंगी, जब हिंदू विवाह अधिनियम में यह बदलाव हो जाए कि वह व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है यदि वह बेटा पैदा करके न दे।

मैं जिस गलती की सजा भुगत रही हूं – वह ये कि मेरे गर्भ में बेटियां आयीं और मैंने गर्भपात करवाने से मना कर दिया। मेरा कई ऐसे लोगों से सामना हुआ है और उनका मानना है कि मेरे पति और ससुराल के लोगों का यह सोचना कि एक बेटा चाहिए, जायज़ है। हर परिवार की ऐसी मंशा होती है। मेरे एक सहकर्मी डॉक्‍टर का मानना है कि दूसरे या उसके बाद के गर्भधारण के लिए सेक्‍स डिटर्मिनेशन व मादा भ्रूण हत्या को कानूनन जायज़ बना देना चाहिए। मेरे कई डॉक्‍टर साथी, जिनकी शादी हो गयी है और उनकी एक बेटी है, बेटा नहीं, उनका मानना है कि सेक्‍स डिटर्मिनेशन व मादा भ्रूण हत्या के लिए वे तैयार हैं क्‍योंकि उनके ससुराल वालों को एक बेटा चाहिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जो कदम मैंने उठाया है, वो ऐसा नहीं करेंगे। क्‍योंकि वो बच्चे के लिए एक स्थायी घर व पिता चाहते हैं।

कई ग़रीब मरीज़ मेरे पास ऐसे आते हैं, जो बेटों की चाह में कई-कई बेटियां जनमा चुके हैं। कई बार मुझे ऐसा लगता है कि क्‍या हमारा समाज औरतों को सिर्फ बेटा पैदा करने की मशीन समझता है? मेरी जैसी स्त्रियां, जो ऐसा नहीं सोचतीं कि महिलाएं जन्मजात पुरुषों से अलग हैं और बेटियों का गर्भपात करने से मना कर देती हैं, वे समाज की नज़र में अपराधी हैं। उन्हें पागल समझा जाता है। आज भी कई लोगों की मेरे पति व ससुरालवालों के प्रति सहानुभूति है। लेकिन मैं आपसे ही पूछना चाहती हूं क्‍या एक सृजनशील स्त्री अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को सिर्फ इसलिए मार दे कि वह मादा है? क्‍या मानवता या ममत्व के नाते ऐसा करना अपराध है? शायद अपराध तब होता, जब मैं अपनी बच्चियों को कोख में ही मार डालती या जन्म के बाद उन्हें मार डालती या किसी और को दे देती। लेकिन एक मां होने के नाते मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती थी? ज़रा आप भी सोचिए। क्‍या मुझे इसकी सज़ा मिलनी चाहिए? शायद नहीं? यदि मुझे मिली तब भी कोई बात नहीं परंतु मेरी बेटियों को भी इसकी सज़ा मिल रही है, जो मुझे क़तई बरदाश्त नहीं। मैं उन्हें उनका हक़ दिलवा कर रहूंगी। मैं इस लड़ाई में अकेली हूं, पर यक़ीन मानिए, यह लड़ाई मेरे अकेले की नहीं है। इससे अन्य महिलाओं को भी न्याय मिल पाएगा। जो मेरी तरह आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, वो कैसे इतनी बड़ी लड़ाई लड़ कर न्याय हासिल कर पाएंगी। मैं चाहती हूं कि मेरी तरह फिर किसी महिला को घर से न निकाला जाए और उनकी बेटियों को उनका पूरा अधिकार मिले।

यह कहानी भेजने के क्रम में मुझे ख़बर मिली है कि कोर्ट ने अस्पताल को सम्मन जारी कर दिया है और डॉ मीतू को बयान के लिए बुलाया गया है। केस की तारीख 1 दिसंबर है। लेकिन डॉ कमल खुराना अब एक नयी चाल चल रहे हैं और अपने बचाव के लिए वे बेटियों को कस्टडी में लेना चाहते हैं। यह सोचनेवाली बात है कि चार साल के बाद आचानक उनका बेटियों के प्रति प्रेम कैसे उमड़ पड़ा, जिन्हें वे गर्भ में और पैदा होने के बाद भी मार डालना चाहते थे, पैसे देकर केस वापस लेने का दबाव बना रहे थे, तलाक की बात कर रहे थे? कहीं ये उन मासूम जानों को मार डालने की साज़‍िश तो नहीं है?

(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात ख़बर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्‍वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्‍पी। प्रभात ख़बर के लिए ब्‍लॉगिंग पर नियमित स्‍तंभ लेखन।)

. 13 Comments »

संजय ग्रोवर said:
मीतूजी, आपकी कहानी पढ़कर ज़रा भी हैरानी नहीं हुई। ऐसे पतियों और ऐसी सासों से हमारा समाज भरा पड़ा है। आप विरोध तो कर रही हैं, ऐसी औरतें भी हैं जो सब कुछ सहकर भी समाज और रीति-रिवाजों को प्राथमिकता देती हैं। ज़रुर इसके पीछे उनके कई तरह के डर, मजबूरियां और बचपन से बना मानसिक अनुकूलन भी होता है। यहां ऐसे न जाने कितने भाई हैं जिनकी योग्य बहिनें भी या तो कुंवारी बैठी हैं या ससुरालों में प्रताड़नाएं झेल रही हैं। मगर वे भाई और पिता रीति-रिवाजों और कुप्रथाऔं को किसी भी क़ीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं। मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार हमें कुछ सख्त निर्णय तो लेने ही पड़ेंगे। जैसेकि हमें बदलाव और न्याय चाहिएं या कि समाज, रीति-रिवाज, तथाकथित सभ्यता-संस्कृति, धर्म, बिरादरी आदि-आदि। हमें यह भी सोचना होगा कि क्या शादी ही किसी स्त्री या पुरुष की ज़िंदगी की आखिरी मंज़िल है !?
.# 21 November 2009 at 11:13 am

विनीत कुमार said:
मीतू,आपके साहस को सलाम करता हूं। मैंने तीन-चार ऐसे केस बहुत ही करीब से देखे हैं। जो सलाह और दबाब आपको पुलिस और ज्यूडिशियरी की तरफ से दी जा रही है,बहुत आम है। लेकिन ये कहते हुए कि आप डटीं रहीं,ये भाव भी शामिल है कि हम जैसे लोगों की जहां से और जिस रुप में जरुरत है,बेहिचक बताएं। मेरा नंबर है-9811853307। पता नहीं आपने कौन सा वकील किया है लेकिन हाई कोर्ट में अरविंद जैन हैं। वो स्त्री के मसले को लेकर संवेदनशील हैं,इसी से जुड़े मसले पर काम करते हैं। मैंने उनकी किताब उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार पर विस्तार से लिखा है। आप एक बार उनसे जरुर संपर्क करें।..और हां समझौता तो बिल्कुल भी न करें। मध्यवर्ग का पुरुष समाज बहुत ही कमीना होता है। वो आपकी जिंदगी पहले से भी नारकीय कर देगा। आप कहें तो मैं अरविंद जैन का भी नंबर आपको दे दूंगा।
.# 21 November 2009 at 11:35 am

Rajnish Kumar said:
एकतरफा बात सुन कर किसी के प्रति खराब ओपिनियन नहीं बनानी चाहिए, आप जो कह रहे हैं वह सही भी हो सकता है और गलत भी । अपनी बात सबसे सही आप ही जानती होंगी, अगर ये सारी बातें हूबहू सही हैं, तो आप घोर अमानवीयता की शिकार हैं और ऐसे लोगों के साथ रहने का कोई मतलब नहीं है । लेकिन, अगर किसी दूसरे छोटी-छोटी बातों पर अपने पति या परिवार से दूरी बढ़ती चली गयी है तो आप सारे इगो, घमंड को छोड़कर अपने पति को विश्वास में लेकर खुशहाल जीवन फिर से बीता सकती हैं । हो सकता है कि मेरे इस प्रतिक्रिया पर मुझको गाली मिले, पर मैंने खुद अनुभव किया है यह सब । पति-पत्नी के अधिकांश झगड़े अहं की टकराव के चलते होते हैं, और नाहक बड़ा रुप ले लेते हैं । मैं आपके इस नारकीय जीवन से जल्दी उबरने की भगवान से प्रार्थना कर सकता हूँ, बाकि तो आपको और आपके पति को करना है । आप हमेशा यह ध्यान रखिएगा कि जो हम कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा- सुखी जीवन या नारकीय (इसे अपने बेटियों को भी ध्यान में रख कर सोचिएगा) ।
.# 22 November 2009 at 9:00 am

ravish kumar said:
मीतू खुराना हम आपकी तकलीफों के तो सहभागी नहीं बने लेकिन जो हिम्मत आपने दिखाई है,उसे सलाम। आप लड़िये।ये सिर्फ आपकी लड़ाई नहीं है। हर पैदा होने वाली लड़की की लड़ाई है। मेरी बेटी की लड़ाई है। हम सब आपकी मदद करेंगे। आपके दर्द को मैंने अपने सामाजिक परिवेश में भी महसूस किया है। मेरी भाभी को आज भी रिश्तेदार ताना दे जाते हैं। धमका जाते हैं कि देखते हैं कि बेटियों की शादी कहां करोगी। रात भर वो अचेतन अवस्था में पड़ी रहती हैं लेकिन सुबह न जाने कहां से वो गज़ब का साहस ले आती हैं और अपने जीवन से लड़ने लगती हैं। इस तरह की धमकी मुझे भी एक रिश्तेदार दे गया। कहा कि अब तो बेटी हो गई है लोगों से मिला जुला करो। इशारा साफ था कि इन चिरकुटों की चौधराहट स्वीकार करूं। इसलिए अपने पैसे से खरीदे गए मकान में मैं किसी को आने नहीं देता। इस तरह की बात जो करता हैं उन्हें निकाल देता हूं। उन जनाब को भी निकाल दिया था।

हमारा समाज मूलत एक भ्रष्ट समाज है। इसीलिए सिस्टम भ्रष्ट है। पूरी रिश्तेदारी जुट कर रिश्वत कमाती
है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आपके इन दुखों से इस चोर समाज को कोई सहानुभूति नहीं होगी। लेकिन जिस तरह से आवाज उठाई है वो अगर लाखों लोगों तक पहुंचे तो हर घर में बेआवाज़ बहुओं तक आपकी बात पहुंचेगी और मन ही मन गूंजेगी।
.# 22 November 2009 at 9:43 am

रंगनाथ सिंह said:
ऐसे शातिर अपराधी पेशेवरों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि नजीर बने। निश्चय ही इनका जुर्म सामान्य नागरिक से कई गुना ज्यादा गंभीर है। इस तरह के साक्षर कीड़े सभ्य-समाज को बदबूदार बनाते हैं।
.# 22 November 2009 at 11:47 am

संजय ग्रोवर said:
रवीश भाई, विनीत भाई, रंगनाथ भाई की बातों से और बल मिला है। ये सब साहसी और समर्थ लोग हैं। भाई अरविंद जैन जैसे लोग हैं। और भी लोग हैं जो ज़रुर साथ आएंगे। मेरा पता और नंबर मोहल्ला माडरेटर अविनाश भाई के पास है, वे जब कहेंगे, हाज़िर होऊंगा।
.# 22 November 2009 at 3:04 pm

Vibha Rani said:
जब भी हम समाज की ऐसी बातों की ओर उंगली उठाते हैं, आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि यह सब अशिक्षा और गरीबी की वज़ह से है. मीतू खुराना का यह मामला तो अशिक्षा या गरीबी का नहीं है. यह पूरी की पूरे मानसिकता का है. इसी से व्यथित हो कर मेरे ‘बालचंदा’ नाटक का सृजन हुआ. और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ का भी. सौभाग्य से मेरी दो बेटियां हैं और मेरे पति या मेरी ससुरालवालों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की. फिर भी अक्सर यह बताने पर कि मेरी दो बेटियां ही हैं, लोगों के मुंह से निकलता है, “जा, बेटा नहीं है?” या “एक बेटा करके बंद करना था न” या भगवान की मर्ज़ी” या “बेटी भी आजकल बेटा ही है.” पढे लिखे समाज में जब यह सब होता है तो कितना मानसिक आघात लगता है, यह हम जैसी माताओं से पूछें. मीतू तो सचमुच में आदर्श है और मोहल्ला लाइव से मैं अनुरोध करूंगी कि वह उनके साथ रहे और इसके सभी पाठकों, लेखकों से भी आग्रह होगा कि वे सभी मीतू की लडाई में उनके साथ रहें.
.# 24 November 2009 at 9:49 am

विजयशंकर चतुर्वेदी said:
मीतू खुराना जी की लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है. इसे अंजाम तक पहुंचाना ही होगा. साथियों से जो बन पड़े, अवश्य करना चाहिए ताकि यह एक और करुण प्रसंग बन कर न रह जाए. इस मुद्दे को सतह पर लाने के लिए अनुपमा जी बधाई की पात्र हैं.
यहाँ मैं सिर्फ इतना जोड़ना चाहूंगा कि पुत्री के जन्म लेने पर मध्यवर्गीय समाज सिर्फ उसकी माता को ही नहीं बल्कि पिता को भी गहरे हीनभाव से देखने लगता है. उसका कुछ-कुछ ऐसा रवैया भी होता है कि बच्चू बहुत अकड़ता फिरता था, अब बचकर कहाँ जाएगा. लेकिन इससे बचने का तरीका भी यही है कि अपनी पुत्री का विवाह सगोत्रीय ही हो, इस लोभ-भय-आशंका-कुलनाश आदि के विचार से बच निकला जाए. ख़ैर, यह समाजशास्त्रीय बहस में उलझने का वक्त नहीं है.

…फिलहाल तो मीतू खुराना जी का साथ देना है.
.# 25 November 2009 at 5:18 pm

dr mitu khurana said:
thanks for all the support . please help me save my daughters. if they go for one day also to that house anything can happen.please help me
.# 25 November 2009 at 10:59 pm

Ravindra Singh said:
aurat teri yahi kahani aanchal mai dhudh ankon mai pani…..
jiski hifajat bhagwaan karta hai use kon mar sakta hai….
.# 1 December 2009 at 6:31 pm

tippu said:
mitu ji, aapne itna bardasht kyo kiya? aapki himmat ko salam
.# 2 December 2009 at 4:43 pm

prakash said:
mitu ji aap ke jajbe ko salam. aap sanghars jari rakho.

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Author: savedaughters19

This is a coverage of my struggles to save my daughters.I am thank full to my parents not only for Not killing me ,but also helping me save my daughters... My dream- A big shelter house for women who want to give birth to their daughters and raise them up with dignity and self respect , but have to fight their own families to do so. Will have medical facilities and facilities for legal aid. will have training centers for vocational courses so that they can stand up on their own two feet and stop the dependency on their husbands for finances, A child care center run and managed by the inmates, A kitchen and a vegetable farm run and managed by the inmates. At present only a dream.... But with grace of God will become a reality. God will show the way and means to achieve the dream.

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